कोई 50 साल में पहली बार इतना ठाले बैठे हैं कि रोटी भी नहीं धंसती..जिनकी बदौलत हम कैद हुए , वो संभलें तो महामारी से हमारी जान छूटे

जयपुर.  64 साल से अमर सिंह सारण चुरू में तारानगर तहसील के हैं। लॉकडाउन के चलते वो सांगानेर में रह गए। उधर उनका एक बेटा गुजरात में अटका हुआ है। बाकी परिवार गांव में है। जिंदगी पहली बार तीन जगह कैद है। लॉकडाउन के दौरान अमर सिंह पहली बार इतना खाली बैठे हैं, बस यही बात उनको साल रही है। समय काटे नहीं कटता, फैक्ट्री में करने को कुछ नहीं है। अकेले ही खुद का खाना बनाते हैं। बस समय कट रहा है। शुरुआती कुछ दिन तो दिन पूरा पहाड़ की तरह काटना मुहाल था, लेकिन अब फैक्ट्री के कुछ दूसरे कर्मचारियों के साथ हंसी-ठिठोली में दिन बीत जाता है।


गनीमत है कि सेठजी ने कोई तनख्वाह नहीं काटी। थोड़े में खाने का गुजारा चल रहा है। बस इंतजार है कि कब ये ताला खुले और जिंदगी पटरी पर आए। ताकि एक बार पूरा परिवार एक साथ बैठ सके। बस यही दौलत है उनके पास। बीमारी के बारे में पूछने पर अमर सिंह कहते हैं कि सेठजी ने कई बार इस बारे में बता दिया है, अब जान गए हैं। शुकर है बाहर वाले भी इस बात को जान लें तो महामारी से जान छूटे और हम गरीबों की जिंदगी पटरी पर आए।


दिक्कत लॉकडाउन से नहीं साब, ठाले बैठने से है


बिहार में मधुबनी के गोपी दास (27) और अरुण पाठक (43) भी लॉकडाउन में है। कहते हैं अब तो जो लोग साथ रह रहे हैं, वही परिवार है। दोनों चाहते हैं कि सरकार बस इतना साफ कर दे कि लॉकडाउन बढ़ेगा या नहीं। बढ़ता है तो जो लोग यहां अटके हुए हैं, उनको घर पहुंचाने की व्यवस्था हो जाए और या फिर काम की छूट दे। आखिर ठाले-बैठे कितने दिन पेट पलता रहेगा। सेठ लोग भी कब तक देंगे। फिलहाल उनका बिश्वास जमा हुआ है कि यहां कोई दिक्कत नहीं आएगी। परिवार को भी यह मजबूती दे दी है।